13 करोड़ 80 लाख वाली गंदगी के सहारे बक्सर में खेला जा रहा है गन्दा खेल खामोश है साहब !

 गजबे है बिहार का बक्सर जिला ! अपनी जेब गरम करने के लिए मिटाई जा रही है 971 साल पुराना राजा रुद्र देव् के किले का इतिहास.खामोश है साहब ! 13 करोड़ 80 लाख वाली गंदगी के सहारे बक्सर में खेला जा रहा है गंदा खेल ! लोगो ने कहा हद हो गई साहब!

राजा रुद्रदेव का किला की दीवारें

बक्सर-ये बिहार का बक्सर जिला है साहब ! यंहा कानून तोड़ने से लेकर, कानून को ताक पर रखने का काम यंहा के सरकारी महकमे में बैठे कुछ अधिकारी, कुछ राजनेता, और तथा कथित कुछ समाज के सफेदपोश ही करते है.जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना ही पड़ता है. अपने जेब को गरम करने के लिए, न तो ये इतिहास के धरोहर का प्रवाह करते है.और न ही धर्म का. इनका मकसद सिर्फ पैसा कमाना है.चाहे इसके लिए,इतिहास।मिटाना पड़े, या धर्म की धज्जियां उड़ाना पड़े. मामला  बक्सर में 1054 ईस्वी में स्थापित राजा रुद्रदेव के किले से जुड़ा हुआ है.971 साल पुराने इस किले के इतिहास को एक साजिश के तहत मिटाई जा रही है.13 करोड़ 80 लाख वाली गंदगी के सहारे, गंदा खेल खेला जा रहा है.और लोगो ने जुबान पर ताला लगा रखी है. हैरानी की बात है कि इस स्थल से सटे सरकारी विद्यालय है. जंहा के अधिकांश बच्चों ने स्कूल आना ही छोड़ दिया.

13 करोड़ 80 लाख वाली गंदगी की क्या कहानी?

13 करोड़ 80 लाख वाली गंदगी किला के दीवाल के पास

जिले के बक्सर नगर परिषद क्षेत्र में कुल 42 वार्ड है.इस नगर परिषद क्षेत्र के साफ, सफाई से लेकर विकास के लिए 1 अरब 66 करोड़ का बजट बनाया गया है. इस भारी भरकम राशि में से स्वच्छता पदाधिकारी के अनुसार 13 करोड़ 80 लाख सलीना , इस शहर की गंदगी को उठाव करने के लिए खर्च की जाती है. जनता की सरकार के नाम से मशहूर, बक्सर नप की सरकार के देख -रेख में, खतीबा में करोड़ो रूपये खर्च कर कूड़ा डंपिंग जोन बनाया गया. जिसका श्रेय लेने के लिए सियासत दलों के बीच होड़।मचा रहा. उद्घाटन के समय शहर की सारी गंदगी को वहां डंप करने के लिए,मास्टर प्लान कागजो पर तैयार की गई. लेकिन वह मास्टर प्लान हाथी के दांत के जैसा केवल दिखाने के लिए बना. और उस गंदगी के आड़ में साहब रात के अंधेरे में गंदे खेल खेलकर सारे कूड़े को किला मैदान में ही डंप कराने लगे.और उसके ऊपर मिट्टी गिराकर अपनी नाकामी को दबाने लगे. जिसकी तस्वीर कैमरे में कैद हो गई. तो बहाना बनाने लगे. चेहरे को छुपाने लगे.

षड्यंत्र के तहत खेला जा रहा है यह खेल !

किला की मिटाई जा रही है पहचान

किसी भी किले की सुरक्षा के लिए किले की चारो तरफ खाई बनाकर उसमें पानी भर दिया जाता था. जिससे कि दुश्मनों या जंगली जानवरों से किले के अंदर रहने वाले लोगों की हिफाजत किया जा सके. ठीक उसी संरचना के आधार पर राजा रुद्रदेव ने 1054 ईस्वी में उत्तरायणी गंगा की तट पर किले का निर्माण करवाया था.971 साल पुराने इस किले की इत्तिहास को मिटाने के लिए,एक षड्यंत्र के तहत किले के चारो तरफ बनाई गई खाई में,शहर के तमाम कचड़े को डंप कर उसे मिट्टी से ढका जा रहा है. स्थानीय लोगो की माने तो , इस खाई को भरने के बाद पार्किंग स्थल बनाने की तैयारी है. कूड़े के बदले मिट्टी वर्क के नाम पर सारा पैसा निकालकर हजम कर लिया जाएगा. करोड़ो का बिल बना लिया जाएगा.

क्या है इस किले का इत्तिहास और वर्तमान ?

बक्सर किला, जिसे राजा रुद्र देव के किले के नाम से भी जाना जाता है, 1054 ईस्वी में राजा रुद्र देव द्वारा गंगा नदी के तट पर बनाया गया था. यह किला बक्सर शहर के इतिहास और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह किला 1764 के बक्सर युद्ध का गवाह है, जिसमें अंग्रेजों ने शुजाउद्दौला, मीर कासिम और शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना को हराया था.प्राचीर और पुराने कक्ष आज भी उस युद्धकालीन रणनीति और संरचना को दर्शाते हैं.1926-27 में किले के पास खुदाई में तीसरी और चौथी शताब्दी ईस्वी की ब्राह्मी लिपि में दो मुहरें मिलीं थी. किले का एक हिस्सा गंगा नदी के कटाव के कारण क्षतिग्रस्त हो गया है, लेकिन यह अभी भी एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है. किले के अंदर एक भूमिगत मार्ग था जिसे पातालगंगा के नाम से जाना जाता था. जिसका साक्ष्य आज भी मौजूद है.फ्रांसिस बुकानन और अलेक्जेंडर कनिंघम जैसे प्रसिद्ध पुरातत्वविदों ने 18वीं शताब्दी में किले का दौरा किया था. वर्तमान में किले में एक अतिथि गृह, जिला जज का आवास और भैरवनाथ का मंदिर भी स्थित है.बक्सर किला न केवल एक ऐतिहासिक स्मारक है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल भी है. यह किला बक्सर शहर के गौरवशाली अतीत और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है. जिसके अस्तित्व को मिटाने के लिए षड्यंत्र किया जा रहा है.

क्या कहते है स्थानीय लोग ?

आस-पास झोपड़ीनुमा मकान में रह रहे लोगो ने बताया कि,यह बड़े स्तर का खेल है.जब शहर शांत हो जाता है. तो कई सफेदपोश इस कूड़ा,कचड़ा के आस पास नजर आते है.कुछ देर बाद जेसीबी मशीन आती है.और पूरे कचड़े को समतल कर उस पर मिट्टी डाल दिया जाता है. जब कोई मोबाइल से फोटो बनाने लगता है.तो लोग गमछे से चेहरा छुपाकर निकल जाते है. पहले इस किले के चारो तरफ बने खाई को देखने के लिए दूर -दूर से इतिहास के विद्यार्थी आते थे. अब तो लोग इस रास्ते से गंगा घाट पर भी जाना छोड़ दिया.महज 100 मीटर की दूरी पर नाथ बाबा मंदिर और गंगा घाट है.डर से कोई मुँह नही खोलता है.की अतिक्रमण के नाम पर पहले हमलोगों के झोपड़ी ही उजाड़ने की धमकी दी जाती है.

गौरतलब है कि शहर से निकलने वाले कचड़े को डंप करने के लिए, इटाढ़ी प्रखण्ड में कूड़ा डंपिंग जोन बनाया गया है.उसके बाद भी शहर के गंदगी को उठाकर शहर में ही डंप किया जा रहा है.ऐसे में सवाल उठ रहा है कि इसके पीछे किसकी मौन सहमति है. क्योकि इस स्थल से महज 100-200 मीटर।की दूरी पर एसडीएम का आवास, उपविकास आयुक्त का आवास, एसडीपीओ का आवास, जज का आवास सरकारी विद्यालय, और एक बड़ा मार्केट, मजार स्थित है.

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