जंहा से त्रेतायुग में भगवान राम ने पंचकोशी यात्रा का की थी शुरुवात ! उसी रामरेखा घाट से 28 अगस्त को विश्वामित्र सेना भरेगी हुंकार !

 रामरेखा घाट से विश्वामित्र सेना 28 अगस्त को भरेगी हुंकार, त्रेतायुग में भगवान राम इसी गंगा तट से पंचकोशी यात्रा का की थी शुरुवात ! उसी पंचकोशी यात्रा से बक्सर को धार्मिक पर्यटन नगरी बनाने का संकल्प के साथ मैदान में उतरी विश्वामित्र सेना !

संगठन के साथियों के साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष

बक्सर-जिला एक बार फिर आध्यात्मिक चेतना की ओर अग्रसर है. 28 अगस्त को विश्वामित्र सेना रामरेखा घाट से पंचकोशी परिक्रमा यात्रा का श्रीगणेश करेगी. इस ऐतिहासिक आयोजन का उद्देश्य बक्सर को विश्वामित्र सर्किट के रूप में विकसित कर एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र बनाना है.

राजनीतिक स्टंट नही, विकसित बक्सर बनाने का संकल्प !

28 अगस्त से शुरू हो रहे विश्वामित्र सेना का यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि त्रेतायुगीन परंपराओं के पुनरुद्धार का प्रयास है. मान्यता है कि इसी रामरेखा घाट से भगवान श्रीराम ने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से 84 हजार ऋषियों और साधु-संतों के साथ पंचकोशी यात्रा की शुरुवात की थी. यह यात्रा उन्होंने तड़का राक्षसी का वध करने के पश्चात नारी हत्या दोष से मुक्ति पाने के उद्देश्य से की थी, जिससे यह क्षेत्र तप, साधना और प्रायश्चित का प्रतीक बना.विश्वामित्र सेना इसी परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए रामरेखा घाट से यात्रा प्रारंभ करेगी, जो पंचकोशी से जुड़े पांच पवित्र स्थलों अहिल्या की उद्धार स्थली अहिरौली, नारद मुनि का आश्रम नदांव, भार्गव ऋषि का आश्रम भभुअर, उद्दालक ऋषि का आश्रम उन्नवस, होते हुए विश्वामित्र की पावन नगरी बक्सर में इस यात्रा का समापन करेगी.इन स्थलों का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अविस्मरणीय है, परंतु आज भी ये उपेक्षा के शिकार हैं. सेना का उद्देश्य है कि इन स्थलों को संरक्षित कर बक्सर को एक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित किया जाए.

क्या कहते है विश्वामित्र सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष !

अपने बदहाली पर आंसू बहा रहे इन धार्मिक स्थलों पर चिंता जाहिर करते हुए, विश्वामित्र सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार चौबे ने कहा कि बक्सर केवल राम की शिक्षा स्थली नहीं, बल्कि वैदिक युग की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक राजधानी रही है. “यह वही भूमि है जहाँ विश्वामित्र ने श्रीराम को ब्रह्मास्त्र का ज्ञान दिया था, जहाँ बालक राम ने ताड़का का वध किया, और जहाँ गुरु का आदेश सर्वोपरि था. ऐसे पवित्र स्थल आज भी आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर हैं, उन्हें बस जागृत करने की जरूरत है.” इसी उद्देश्य के साथ 28 अगस्त को सुबह ग्यारह बजे रामरेखा घाट पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच स्थानीय लोगो के सहयोग से विश्वामित्र सेना यात्रा का शुभारंभ करेगी. यात्रा में जिलेभर से साधु-संत, सामाजिक संगठन, युवा और ग्रामीण श्रद्धालु शामिल होंगे. पूरे मार्ग में भक्ति गीत, और कथा वाचन का आयोजन होगा. साथ ही प्रत्येक पड़ाव पर यात्रियों के स्वागत हेतु विशेष शिविर लगाए जाएंगे.

इस पहल के माध्यम से विश्वामित्र सेना सरकार और प्रशासन से मांग कर रही है कि बक्सर को आधिकारिक रूप से विश्वामित्र सर्किट के रूप में मान्यता मिले. इसके तहत पंचकोशी यात्रा मार्ग को पर्यटन मानचित्र पर शामिल कर मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं – जैसे सड़क, लाइट, जल आपूर्ति, विश्राम स्थल आदि.यह यात्रा न केवल धार्मिक परंपरा का पुनर्जागरण है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत को संजोने का भी सशक्त माध्यम बन सकती है. जिले वासी बक्सर को विकसित बक्सर बनाने में सहयोग करे, तो यह प्रयास आने वाले वर्षों में बक्सर को अयोध्या, काशी और गया की तर्ज पर एक प्रमुख तीर्थनगरी बना सकता है.विश्वामित्र सेना की यह यात्रा अब केवल एक परिक्रमा नहीं, बल्कि बक्सर की आत्मा को जगाने का एक आध्यात्मिक आह्वान बन चुकी है.

गौरतलब है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने अपने यात्रा के पहले पड़ाव में अहिल्या की उद्धार स्थली अहिरौली पहुँचकर, गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बनी अहिल्या का उद्धार कर प्रसाद स्वरूप पुआ पकवान का भोग लगाया था. रात्रि विश्राम के बाद, नारद मुनि के आश्रम नदाव पहुँचे, जंहा खिचड़ी का प्रसाद ग्रहण करने के बाद अपने यात्रा के तीसरे पड़ाव में वे भार्गव ऋषि के आश्रम भभुअर  पहुँचे जंहा  दही चूड़ा का उंन्होने भोग लगाया था. फिर चौथे पड़ाव में उद्दालक ऋषि के आश्रम उन्नवस में पहुँचकर सतु मूली का भोग लगाया,अंत मे भगवान राम चरित्र वन गए जंहा विश्वामित्र के आश्रम के समीप लिट्टी चोखा का भोग लगाया .आज भी प्रत्येक साल अगहन मास में श्रद्धालु इस परंपरा का निर्वाहन करतें है.

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