हर पेड़-दीवार पर लटकते दावेदार, जनता पूछे – "तुम कौन हो यार ?"हाले चुनाव 2025 को लेकर दावेदारो का यही है हाल !

 बक्सर की सड़कों पर नेता नहीं, किराए के जयकारों का मेला ! सेल्फी में नेता बड़े, जमीन पर नही है खड़े !बैनर-होर्डिंग से बक्सर ढका, असली चेहरा जनता से छिपा!पैसे से खरीदे जयकारे, पर भरोसा अब भी उधारे ! हर पेड़-दीवार पर लटकते दावेदार, जनता पूछे – "तुम  कौन हो यार ?"

नेता जी का चुनाव चिन्ह की तस्वीर

बक्सर- बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही बक्सर की गलियां, चौक-चौराहे और बिजली के खंभे नेता जी की महत्वाकांक्षा से पट गए हैं. हर तरफ बैनर, पोस्टर, दीवार लेखन और सोशल मीडिया पर हवाहवाई दावेदारी का शोर है. जो चेहरे अब तक जनता ने देखे तक नहीं, वही "जनसेवक" और "भविष्य के विधायक" लिखकर खुद को टिकट का हकदार साबित करने में जुट गए हैं.स्थिति यह है कि शहर की पहचान अब मंदिरों या ऐतिहासिक स्थलों से नहीं बल्कि नेताओं की रंग-बिरंगी मुस्कान वाले पोस्टरों से हो रही है. बक्सर की दीवारें अब "स्लोगन बोर्ड" में तब्दील हो चुकी हैं और हर ऑटो पर किसी न किसी दावेदार का चेहरा चिपका हुआ है.

जयकारे के ठेके और भीड़ की दलाली!

किसी जमाने में नेता के पीछे जनता चलती थी. आज हालत ये है कि नेता अपने पीछे भीड़ किराए पर रखते हैं. वरीय नेताओं की सभा में "अपने नाम के नारे लगवाने वाले नेता जी को, नारे लगाने वाले आधे लोग न तो  नेता जी का नाम जानते हैं और न ही उनकी पार्टी की विचारधारा. सबको मालूम है कि 300 रुपये के साथ खाना-पीना मिल रहा है, बस नारा लगाना है. यह "लोकतांत्रिक उत्सव" अब "प्रबंधित इवेंट" बन चुका है.

सेल्फी का लोकतंत्र आज के नेताओ  का नया फैशन है !

  कोई भी नेता जी किसी वरिष्ठ नेता के पैर छू लें, मंच पर चढ़ जाएं या गलती से उनके पास खड़े हो जाएं – तुरंत फोटो सोशल मीडिया पर अपलोड होती है और कैप्शन लिख दिया जाता है – "आशीर्वाद मिला, पार्टी का सच्चा सिपाही" मजेदार बात यह है कि जनता उस नेता को पहचानती तक नहीं.

खुद से ही खुद को मान बैठे है विधायक !

हकीकत ये है कि इन दावेदारों की कोई राजनीतिक जमीन नहीं है। गांव की गलियों से लेकर शहर के बाजार तक लोग पूछते हैं – "ये साहब हैं कौन?" लेकिन अखबारों में रंगीन विज्ञापन देकर और टीवी पोर्टलों पर ख़बर छपवाकर नेता जी खुद से ही खुद को विधायक मान चुके हैं. जनता की चुप्पी को उन्होंने समर्थन समझ लिया है, जबकि असलियत यह है कि जनता चुनाव के दिन चुपचाप ईवीएम का बटन दबाकर उनकी औकात याद दिला देती है.

 दर्जनो में दावेदार ! वरीय नेता पूछ रहे है कितना दिन पार्टी का झंडा उठाये हो यार !

भाजपा, कांग्रेस, जदयू, राजद, लोजपा, जनसुराज, निर्दलीय – समेत हर पार्टी में दो चार दर्जन दावेदार खड़े हैं. टिकट चाहे एक हो, लेकिन दावेदारी पचास लोगों की. यह स्थिति किसी कॉमेडी शो से कम नहीं लगती. न तो जनता इनके भाषण सुनने को तैयार है और न ही इनके वादों पर भरोसा करती है. लेकिन नेता जी हैं कि हर मोड़ पर होर्डिंग लगाकर अपनी "लोकप्रियता" साबित करने पर आमादा हैं. जनता के हाथों में

जनता की खामोश हंसी

बक्सर की जनता फिलहाल तमाशा देख रही है। लोग कहते हैं – "नेता जी पोस्टर में चमक रहे हैं, लेकिन गांव में बिजली-पानी पर अंधेरा है।" महिलाओं का कहना है कि "जो अपने मोहल्ले की सड़क नहीं बना पाए, वही अब विधान सभा जीतने चले हैं।" युवाओं की राय और भी तीखी है – "इन नेताओं को हम फेसबुक पर लाइक दे सकते हैं, वोट नहीं।"

गौरतलब है कि बक्सर का माहौल इस समय राजनीतिक नारेबाजी और पोस्टरबाज़ी से गूंज रहा है। लेकिन इस "हवाबाजी राजनीति" की हकीकत जनता खूब समझ रही है। चुनाव आते-आते असली चेहरा सामने आ जाएगा और तब "किराए के जयकारों" और "फर्जी सेल्फियों" की सियासत धरी की धरी रह जाएगी

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