धान की फसल में लगी रोग से त्राहिमाम कर रहे है जिले के किसान ! साहब एसी कमरे के साथ एसी गाड़ी में फरमा रहे है आराम!
धान की फसल में लगी रोग से त्राहिमाम कर रहे है जिले के किसान !साहब एसी कमरे के साथ एसी गाड़ी में फरमा रहे है आराम! आजादी के 79 साल बाद भी सरकारी बाबुओं के मेहरबानी के मोहताज है जिले के किसान ! धरती का सीना चीरने वाले अन्नदाता हैं लाचार, अधिकारी कर रहे कुर्सी पर व्यापार,चुनाव में किसान भगवान, हकीकत में सिर्फ़ बलि का बकरा बनता है किसान !
बक्सर- जिले का किसान इन दिनों अपनी सबसे बड़ी त्रासदी से जूझ रहा है. धान की फसल में रोग और बिल्गोह का आतंक से किसान त्राहिमाम कर रहे है. और साहब एसी कमरे में बैठकर आराम फरमा रहे है, खेत उजड़ रहे हैं, और जिले के अधिकारी, जिनके जिम्मे इन समस्याओं का समाधान निकालना है, वे या तो अपने आरामदायक कमरों में बैठकर बैठकों की खानापूर्ति कर रहे हैं या सरकारी एसी गाड़ियों में सैर-सपाटा कर रहे हैं. स्थिति यह है कि जिले में कृषि टास्कफोर्स की बैठकें महज हवाहवाई साबित हो रही हैं, और किसानों तक योजनाओं का लाभ सिर्फ़ सरकारी फाइलों और कागजों पर ही पहुंच पा रहा है.
खेत में लाचार किसान, कार्यालय में चैन की नींद ले रहे है जिम्मेवरान !
यूरिया के साथ दवा डालते किसान !
अपने लोहे जैसे फ़ौलादी हौसलों के बदौलत 48 डिग्री की तपिश और हाड़ कंपा देने वाली ठंड में खेतों में डटे रहने वाले अन्नदाता धरती का सीना चीरकर अन्न उपजाते हैं. लेकिन विडंबना देखिए—आज वही अन्नदाता खुद दाने-दाने को मोहताज हैं. जिनकी मेहनत से देश का पेट भरता है, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं. दूसरी तरफ, कृषि विभाग के जिम्मेदार सलाहकार, एटीएम और बीटीएम स्तर के अधिकारी किसानों की समस्याओं पर बात करने की बजाय "साहब" के चेंबर में आराम फरमाते नजर आते हैं.
आंकड़े बताते हैं सच्चाई!
उर्वरक में दवा मिलाते किसान
जिले में करीब 2 लाख 22 हजार रजिस्टर्ड किसान हैं. जिनके द्वारा लगभग 1 लाख 7 हजार हेक्टेयर भूमि पर अलग-अलग फसलों की खेती की जाती है. धान, गेहूं, दलहन और तिलहन के अलावे सब्जी जैसी प्रमुख फसलें किसानों की आय का मुख्य साधन हैं. लेकिन मौजूदा हालात में जब धान की फसल पर कीट और रोग का प्रकोप बढ़ा है, तो किसान पूरी तरह से निराश हो चुके हैं. सरकारी योजनाओं के नाम पर बीज, दवा, और तकनीकी सहयोग कागजों में बांटा जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर नतीजे नदारद हैं.
संसाधनहीन है कृषि विज्ञान केंद्र!
किसानों की मदद के लिए स्थापित कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के वैज्ञानिकों के पास भी न तो पर्याप्त संसाधन हैं, न ही कोई सरकारी वाहन जिससे वे किसानों तक सीधे पहुंच सकें. जबकि कागजों पर दावा किया जाता है कि हर गांव और हर किसान तक तकनीकी जानकारी पहुंचाई जा रही है. असलियत यह है कि किसानों के खेतों तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक निजी साधनों पर निर्भर रहते हैं, और कई बार तो उन्हें किसानों की शिकायतें सुनने का मौका ही नहीं मिलता.
साहब की अर्दली भी करता है शाही सवारी
जिले में अधिकारी तो छोड़िए, उनके अर्दली और निजी सहायक तक लाखों की सरकारी गाड़ियों में घूमते हैं. पेट्रोल-डीजल और देखरेख पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन वही गाड़ियां किसानों के खेत तक जाने से कतराती हैं. अधिकारियों के एसी चेंबर और किसानों के पसीने से भीगी झोपड़ियों के बीच का यह फर्क आज बक्सर सहित पूरे प्रदेश के किसान सवाल के रूप में उठा रहे हैं.तमाम कठिनाइयों का सामना कर जैसे ही किसान अपनी खेतो में फसल तैयार करते है तो साहब और नुमाइंदे अख़बार और सोशल मीडिया में पब्लिसिटी के लिए हँसुआ उठाकर क्रॉप कटिंग करने पहुँच जाते है. लेकिन किसानों को उस फसल को तैयार करने में कितनी तकलीफें उठानी पड़ी है. यह जानने का भी प्रयास नही करते!
राजनीति में किसान, हकीकत में बलि का बकरा !
चुनाव आते ही किसानों को भगवान की तरह पूजने का दावा करने वाले नेताओं की भी चुप्पी अब किसानों को अखरने लगी है. चुनावी मंचों पर "किसानों की कर्जमाफी", "खेती को लाभकारी बनाने" और "हर किसान तक सरकारी मदद पहुंचाने" के वादे किए जाते हैं. लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं, किसानों की पुकार सरकार और प्रशासन दोनों के लिए बेमानी हो जाती है.और पांच साल बाद एक बार फिर किसानो के लिए प्रेम जग उठता है.आज किसान यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या उनकी मेहनत सिर्फ़ वोट बैंक बनाने के लिए है? क्या सरकार और प्रशासन का कर्तव्य सिर्फ़ बैठकों की खानापूर्ति करना है? आखिर क्यों वह वैज्ञानिक, वह कृषि अधिकारी, वह सलाहकार जिनकी तनख्वाह किसानों के कर और मेहनत की कमाई से जाती है, किसानों के खेतों तक पहुंचने से कतराते हैं?
गौरतलब है कि जिले के कई ग्रामीण इलाकों में धान की गोफे में कीड़े लग जाने से फसलें सूखने लगी है.इधर बिल्गोह की आतंक से किसान त्राहिमाम कर रहे है.खेतो में लगीं फसल बर्बाद हो रहे है.और साहब ऐसी युक्त बंद कमरे में आराम फरमा रहे है.ऐसे में किसान का बेटा खेतीबाड़ी छोड़कर अब महानगरों में मजदूरी करने के लिए पलायन कर रहे है.



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