नेता बने मालामाल, जनता हो रही कंगाल” जर्जर सड़को पर खड़ी है बेरोजगारों की फौज ! हमारे बक्सर में तो नेताओ का ही है मौज !

 आज़ादी के 79 साल, बक्सर का हाल – नेता बने मालामाल, जनता रही कंगाल” जिला की जर्जर सड़को पर लगा है बेरोजगारों का कतार ! जाती के नाम पर इस बार की  चुनाव में विधायक मुझे ही बना दो मेरे यार ! नेता जी लगा रहे है गुहार ?????

बक्सर- आज़ादी को 79 साल बीत चुके हैं. भारत ने चांद पर झंडा गाड़ दिया, डिजिटल इंडिया का डंका बजा दिया, लेकिन बक्सर की धरती पर आज भी हालात वही हैं, जैसे किसी उपन्यास की उदासी भरी पंक्तियाँ. चारों विधानसभा क्षेत्र की जनता सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा और रोज़गार के लिए तरस रही है. खेतों में उर्वरक और सिंचाई की किल्लत है, किसान की फसल का मूल्य तय करने के लिए कोई पुख्ता मंडी तक नहीं. लेकिन हाँ, जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों के हालात जरूर बदल गए हैं — कोई 10 बर्षो तक विधायक और मंत्री बनकर 700 करोड़ का मालिक बन बैठा है, तो कोई महंगी जमीन पर मॉल और शो-रूम खड़ा कर चुका है.कोई पांच बर्षो में ही  पेट्रोल पंप और अस्पताल का मालिक है, तो कोई अरबों का कारोबार कर रहा है. जनता जातियों का जाप कर भूखों मर रही है.प्रताड़ित हो रही है.

बक्सर की जनता भूखी, नेता नेता सुखी !

नन्ही सी पांव और बड़ी सी जिम्मेवारी सिमबॉलिक तस्वीर

जिस बक्सर के किसान का बेटा रोज़ी-रोटी की तलाश में महानगरों में मज़दूरी करने को मजबूर है, उसी जिले के नेताओं के बेटे विदेशों में पढ़ रहे हैं. यहाँ का युवा बेरोज़गारी की मार झेल रहा है और नेता सरकारी ठेकों, रियल एस्टेट और कमीशनखोरी से अपने साम्राज्य खड़े कर रहे हैं. जनता पूछती है—क्या यही थी आज़ादी की असली कीमत? की मतदाता मालिक भूख से मरे ! और तुम महलों में जश्न मनाओ. निर्दोष जनता पर कहर बरपाओ !

भारत का लोकतंत्र बना नेताओ का लूटतंत्र?

मेरा भारत महान भूखा है किसान !

जिस भारत की लोकतंत्र की डंका पूरे विश्वव में बजती है. उसी लोकतंत्र की दुहाई देने वाली राजनीतिक पार्टियाँ हर चुनाव में एक ही खेल खेलती हैं. इस बार “इनको विधायक बनाइए”, अगले बार “उनको मंत्री बनाइए”.जिससे कि लूटने का मौका पार्टी के सभी नेताओं को मिलता रहे है. और जनता  यह सोचकर खुश होती रहे कि इसने काम नही किया तो पार्टी ने हटा दिया !पिछले 79 बर्षो से यही होते आ रहा है. इधर  जनता को जातीय समीकरणों में फँसाकर नेताओं ने ऐसा मायाजाल रच दिया है कि असली मुद्दे कहीं गुम हो गए. सड़क टूटी है, अस्पताल में दवा नहीं, स्कूल में शिक्षा नहीं, किसान के पास बीज नहीं—लेकिन चुनाव में बहस होती है सिर्फ जाति और धर्म पर. यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि राजनेताओं की बनाई हुई योजनाबद्ध लूटतंत्र है.

आम आदमी से खास बनने का शॉर्टकट फार्मूला है राजनीति !

 राजनीति का सच बड़ा कटु है. देश का हर कलेक्टर, से लेकर कंडक्टर तक,  अफसर से लेकर व्यापारी आज करोड़ो ,अरबो खर्च कर विधायक और सांसद बनना चाहता है. क्यों? क्योंकि विधायक बनते ही ज़मीन, ठेके, कारोबार और पॉवर सब मिल जाता है. जबकि किसान का बेटा मेहनत और पसीने के बावजूद केवल मज़दूर बनता है. असली सामाजिक विडंबना यही है कि आज डीजीपी तक अपने नौकरी छोड़कर विधायक बनने की कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे है. सभी को पता है कि आम से खास बनने का सबसे बड़ा शॉर्टकट फार्मूला राजनीति है!₹???????

नेताओं ने बनाई खुद के लिए महल, जनता का जर्जर घर !

बक्सर की गलियों में घूमकर देखिए—नालियाँ बजबजा रही हैं, बिजली आएगी या नहीं ये भगवान भरोसे है, पानी के लिए महिलाएँ अब भी मटके लेकर कतार में खड़ी रहती हैं. शहर की गंदगी शहर में जमा हो रहा है. दूसरी तरफ नेताओं के आलीशान फार्महाउस और एसी गाड़ियों के काफिले निकलते हैं. जनता के टैक्स से बनी संपत्ति पर जनता की ही पहुँच नहीं. 

79 साल का सवाल   कितना बदला हमारा हालात !

क्या यही है वह सपना ? जिसके लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने फाँसी का फंदा चूमा था? क्या इसीलिए किसान अपने खेतों में खून-पसीना बहाता है कि उसका बेटा पलायन कर महानगरों की ईंट-भट्ठियों पर मजदूरी करे? क्या आज़ादी सिर्फ नेताओं के लिए खजाना खोलने आई थी? बीते 79 बर्षो में जिले के लोगो की हालत कितनी बदली है यह जिले के सभी विधानसभा क्षेत्र की जर्जर सड़को पर खड़ी बेरोजगारों की फौज बता रही है.जिसको देखकर ही रूह कांप जाती है. और लोग अपनी समस्या पर बात करने के बजाए, गले मे जातियों का टैग लटकाकर घूम रहे है.

गौरतलब है कि बक्सर की हालत किसी आईने की तरह है, जिसमें पूरे देश की राजनीति का असली चेहरा दिखता है. जनता भूखी है, किसान कर्ज़ में है, युवा बेरोज़गार है. और नेता? नेता आज़ादी की बरसी पर सिर्फ भाषण देते हैं और अगले चुनाव तक जनता को फिर जातीय समीकरणों की भूलभुलैया में फँसा देते हैं.अब सवाल यह है कि जनता कब जागेगी? कब वह तय करेगी कि सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और रोज़गार ही वोट की असली कसौटी हैं? जब तक जनता जाति और धर्म की राजनीति में बंधी रहेगी, तब तक नेता महलों में और किसान मजदूरी में ही जीते रहेंगे.

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