शक्ति प्रदर्शन में पोस्टर होर्डिंग की लगी होड़ तख्ती थमाने वाले नेता जी को जयकारा लगाने वाले समर्थक भी नही पहचानते धन्य है बक्सर की मातृभूमि !
बक्सर में टिकट की दौड़ ने खोले पार्टी के अंदरूनी पोल ! शक्ति प्रदर्शन में पोस्टर-होर्डिंगों की लगी होड़! मंच से अपने ही दावेदारों को किया गया पोर्डियम के पीछे ! अब उनकी नजरे हो गई है नीचे !
बक्सर- जिले का बक्सर विधानसभा सीट इस बार बिहार की सबसे चर्चित और संवेदनशील राजनीतिक रणभूमियों में शुमार होती जा रही है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह सीट जहां अवसर है, वहीं चुनौतियों का पहाड़ भी. शहर के चौक-चौराहों से लेकर सुदूर ग्रामीण सड़कों तक दावेदारों के बैनर-पोस्टर, कटआउट और शक्ति प्रदर्शन की होड़ मची है. फोटो लगी तख्तियां भाड़े के कार्यकर्ताओं को थमाकर नेता मंचों तक पहुंचने की जद्दोजहद कर रहे हैं. लेकिन एनडीए के हालिया सम्मेलन ने यह साफ कर दिया कि "मंच पर बैठना" अभी हर किसी के बस की बात नहीं.
धनसोइ में दिखाया झांकी, किला मैदान में नही रहा कुछ बाकी !
बिहार सरकार के पूर्व मंत्री संतोष निराला के समर्थन में धनसोइ में आयोजित एनडीए सम्मेलन में कुछ स्थानीय दावेदारों को मंच पर नहीं चढ़ने दिया गया, जबकि एक बड़े नेता के हाथ से माइक तक छीन लिया गया. ऐसे घटनाक्रमों से पार्टी के भीतर गुटबाजी और नाराजगी साफ झलकती है. जिसकी पूरी स्क्रिप्ट भी मंच पर बैठे हुए पार्टी के ही कुछ नेताओं ने पहले से ही लिख रखी थी.
नही पहचानते सर बोला गया चलिये आपका भला होगा !राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा!
इधर, राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’, जन सुराज के अभियान और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की संभावित राजपुर यात्रा से विपक्षी गतिविधियां भी तेजी पकड़ रही हैं. ऐसे में बक्सर की राजनीतिक ज़मीन गरम होती जा रही है. पूर्व मंत्री के व्यवहार में आये परिवर्तन, और वर्तमान विधायक की आम लोगो से बढ़ी दूरी की पूरा फायदा उठाने के फिराक में प्रशांत किशोर के अलावे बहुजन समाज पार्टी के एक -एक कार्यकर्ता पूरे दमखम के साथ लगे हुए है.
एक सीट पर तीन दर्जन दावेदार !
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो भाजपा के पास बक्सर विधानसभा सीट से तीन दर्जन से अधिक दावेदार सामने आ चुके हैं—महिला, युवा, और वरिष्ठ कार्यकर्ता सभी कतार में हैं. लेकिन टिकट तो केवल एक को ही मिलेगा. सवाल उठता है कि टिकट कटने के बाद बाकियों की भूमिका क्या होगी? क्या वे पार्टी के साथ खड़े होंगे या भीतरघात कर चुनावी समीकरण बिगाड़ देंगे?
खामोशी से उभर रही है एक नई शक्ति बीजेपी के गले की बनी फ़ांस !
इन तमाम राजनीतिक उठापटक के बीच एक और शक्ति खामोशी से उभर रही है—विश्वामित्र सेना। महर्षि विश्वामित्र कॉरिडोर, सनातन संस्कृति की उपेक्षा और किसानों की समस्याओं को लेकर संगठन ने मोर्चा खोल रखा है. उनका आरोप है कि “बालक राम को पराक्रमी राम” बनाने वाले बक्सर की घोर उपेक्षा हुई है. जिस राम के जन्मभूमि पर भारत सरकार ने अरबो रुपये खर्च की, मिथिला में अरबो खर्च कर सीता माता की भब्य मंदिर बनाया जा रहा है. मथुरा, वृंदावन, काशी की तर्ज पर बक्सर का विकास क्यो नही किया गया.जिस राम के कर्मभूमि पर स्वयं देश के यशस्वी प्रधानमंत्री जी आये थे. क्या उन्हें भी राम को पराक्रमी राम बनाने वाले इस मातृभूमि को सौगात नही देनी चाहिए थी. बक्सर में क्या है. जिस पटना-बक्सर फॉरलेन सड़को की बखान करते लोग नही थक रहे है.उस पर पूंजीपतियों की ही व्यपारिक गतिविधियां अधिक हो रही है. हमारे नौजवानों को रोजगार चाहिए बक्सर की अपनी पहचान चाहिए ! जिससे कि, पर्यटन के क्षेत्र में बढ़ावा मिल सके! और यह सम्भव केवल महर्षि विश्वामित्र कॉरोडर से ही हो सकता है.जब विदेश सैलानी आएंगे, हमारे यंहा का माहौल बदलेगे. एयरपोर्ट, विश्वविद्यालय, के अलावे रोजगार के नए, नए संसाधन पैदा होगा.राम केवल वोट में नही हमारे आत्म सम्मान में होंना चाहिए! और हमारा आत्म सम्मान वही है कि हमारे बच्चों को इसी बक्सर में उच्च शिक्षा, रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा,के साथ अन्नदाताओं को उनके खेतो तक सुविधा पहुँचे, पूरी दुनिया की पेट भरने वाला हमारा किसान फसल सुख जाने,खराब हो जाने की डर की साये में अपना जीवन जी रहा है.
आयुर्वेद का जननी है हमारा बक्सर !
हमारा बक्सर आयुर्वेद का जननी है. उसके बाद भी आजादी से लेकर अब तक वैदिक परंपरा को संरक्षित करने के लिए किसी भी स्तर से कोई प्रयास नही किया गया. यह वही धरती है जहां च्यवन ऋषि का आश्रम था, जहां से आयुर्वेद का प्रसार हुआ—लेकिन आज राज नेताओ बक्सर के इस पवित्र भूमि को महज एक राजनीतिक सीट मान लिया गया है.
आक्रोश में बदलने लगी है जनता की भावनाएं
जनता की भावनाएं भी अब आक्रोश में बदलने लगी हैं. यदि भाजपा बक्सर में समय रहते स्पष्ट और सर्वमान्य चेहरा सामने नहीं लाती, तो अंदरूनी नाराजगी और विश्वामित्र सेना जैसे सामाजिक आंदोलनों के कारण यह सीट चुनौतीपूर्ण बन सकती है.बक्सर की जनता अब नारों और मंचों से ऊपर उठ चुकी है—उसे चाहिए ठोस विकास, स्पष्ट नेतृत्व और संस्कृति के प्रति सम्मान. पार्टी जिसे भी टिकट दे, उसे पहले जनता का विश्वास जीतना होगा. नहीं तो मंच के पीछे बैठने वालों की नाराजगी और जनता की उपेक्षा, किसी भी दावेदार को टिकट मिलने के बावजूद चुनाव हार का कारण बना सकती है.बक्सर की राजनीति अब "केवल चुनाव लड़ने" तक सीमित नहीं रही. यह अब सांस्कृतिक अस्मिता, स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व की पारदर्शिता का सवाल बन चुकी है.
नेताओ ने बदल ली चेहरे दिखाने वाले आईने
बक्सर विधानसभा सीट पर इस बार चुनावी अखाड़ा सजने से पहले ही धूल उड़ने लगी है — और वो भी इतनी कि अपने-अपने चेहरे को चमकाने के लिए नेताओं ने आईना ही बदल लिया है. हालात ये हैं कि अभी तक टिकट की घोषणा भी नहीं हुई है, लेकिन मैदान में खड़े "तीन दर्जन योद्धा" युद्ध के मूड में हैं — पोस्टर के पीछे छुपे चेहरे, कटआउट के आगे झुकी पीठ और किराए के जयकारों से गूंजती गलियां चीख -चीखकर इनकी आत्मकथा को बता रही है.
विधानसभा चुनाव या सेल्फी प्रतियोगिता !
बक्सर शहर के चौक-चौराहों से लेकर गांव की गलियों तक हर तीसरा बिजली का खंभा, हर दूसरा पेड़ और हर पहला ऑटो एक दावेदार की पहचान बना बैठा है. जिन नेताओं को जनता जानती नहीं, वे भी बैनर पर "जनसेवक" लिखकर टिकट मांग रहे हैं ये राजनीति है या सेल्फी प्रतियोगिता — समझना मुश्किल हो गया है.
गौरतलब है कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा होने से पूर्व ही, शहर को छोड़कर अब सुदूर ग्रामीण इलाके को नए -नए दावेदारो ने बैनर- और पोस्टर से पार्ट दिया है.जिससे ग्रामीण भी हैरान है.की ये महिलाये या नौजवान युवक अपने पूरे जीवन में कभी एक बार भी इन गांवों में दर्शन नही दिया.वह हमारा नेतृत्व करेगा??????





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