बक्सर में मतदाता कम, दावेदार ज्यादा. बेरोजगार नेता जी जनता को रोजगार बांटने का कर रहे है दावा ! टिकट की खोज में नेता जी, नेता जी की खोज में भटक रही है जनता !

 बक्सर में मतदाता कम, दावेदार ज्यादा. बेरोजगार नेता जी जनता को रोजगार बांटने का कर रहे है दावा ! टिकट की खोज में नेता जी, नेता जी की खोज में भटक रही है जनता ! पैसे से खरीद रहे है हसीन सपने, सोशल मीडिया गुरु बता रहे नतीजे! जनता की जेब काटकर अरबपति बने कुछ पतियों की पत्नियां चंद सिक्के बांटकर खुद को बता रही है समाज का सबसे बड़ा जनसेवक ! 

चुनाव से पहले ही पार्टी के अंदर संग्राम

बक्सर-  2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल भले ही औपचारिक रूप से अभी न बजा हो, लेकिन बक्सर जिले में चुनावी जंग का रंग ऐसा चढ़ा है कि लग रहा है जैसे मतदाता से अधिक उम्मीदवार पहले ही मैदान में उतर चुके हैं. हालात यह हैं कि टिकट दिलवाने से लेकर चुनाव जितवाने तक के दावे करने वाले खुद को भावी विधायक घोषित कर सोशल मीडिया पर बधाई संदेश तक स्वीकार रहे हैं. और ख्वाबो की दुनिया में गोते लगा रहे है. पूरे जीवन दूसरे का जेब काटकर अरबपति बने पतियों की पत्नियां  चंद सिक्को की खनक के बदौलत खुद से ही खुद को मसीह बता रही है.टिकट की खोज में नेता जी, तो नेता जी की खोज में भटक रही है.

टिकट का बाजार और दावेदारों की कतार

शहर का नजारा गवाह है कि किस तरह टिकट के लिए नेता जी से लेकर उनके सिपहसालार तक बेचैन पटना से दिल्ली का दौड़ लगा रहे हैं. कोई पोस्टर लगाकर खुद को जनसेवक बता रहा है तो कोई बधाई संदेश में "विजयी भावी विधायक" कहलाने की होड़ में है. सोशल मीडिया पर तस्वीरों और मैसेज का अंबार लगा है, मानो चुनाव हो चुका और नतीजे घोषित भी हो गए.

मैं ही असली भारत हूँ! एसी में नही आईसीयू में है जिंदगी !

पैसे से बनाये और हराये जा रहे है विधायक !

बक्सर के हर नुक्कड़-चौराहे पर आपको चमकते पोस्टर और कटआउट दिखाई देंगे. घण्टा घर से लेकर ज्योति चौक, अम्बेडकर चौक, स्टेशन रोड और सिंडिकेट गोलंबर तक बिजली के खंभों, बड़ी इमारतों की दीवारों और ऑटो पर लटकते पोस्टर यह बता रहे हैं कि असली राजनीति अब विचारधारा से नहीं, पैसे से चल रही है. दावेदार अपनी जेब से खर्च कर जनता के बीच सिर्फ अपनी तस्वीरें बांट रहे हैं और उसी पैसे से भविष्य का टिकट खरीदने की कोशिश में लगे हैं. सोशल मीडिया गुरु पैसे से विधायक बनवा रहे है.और चुनाव हरवा रहे है.

सोशल मीडिया गुरुओं का चुनावी खेल

असली भारत की ग्रामीण एक्सप्रेसवे

दिलचस्प यह है कि चुनावी प्रचार से पहले ही बक्सर के "सोशल मीडिया गुरु" चुनाव परिणाम बताने लगे हैं. फेसबुक और व्हाट्सएप पर कोई खुद को जनता का असली नेता साबित कर रहा है तो कोई विरोधी दावेदार को आईटी सेल की ट्रोल आर्मी से नेस्तनाबूद करने की कोशिश कर रहा है. यह वही गुरू हैं, जो पहले "लाइक और कमेंट" बेचते थे और अब भविष्यवाणी करने वाले राजनीतिक पंडित बन चुनाव के परिणाम और जनता का मिजाज घर में बैठकर ही बेच रहे है.

पार्टी के भीतर घमासान!

दूसरी ओर पार्टी के वरीय नेताओं के खिलाफ भी नए दावेदार शिकायत लेकर खड़े हैं. टिकट न मिलने का डर इतना गहरा है कि लोग अपनी ही पार्टी के सीनियर नेताओं को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. पोस्टरों और बयानों में वफादारी की कसमें खाई जा रही हैं, लेकिन अंदरखाने टिकट हथियाने के लिए तलवारें खिंच चुकी हैं.

मुद्दे गायब, दिखावा हावी !

बक्सर की जनता जिन मुद्दों से जूझ रही है – सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार – वे कहीं गायब हैं. मंच पर नेता जी रोजगार देने का दावा करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर दावेदार खुद बेरोजगार की तरह इधर-उधर पोस्टर लगवाने और भीड़ जुटाने में ही उलझे हैं. जनता की जेब काटकर खुद की जेब भरने वाले नेता आज समाज का सबसे बड़ा सेवक बताकर हास्यास्पद स्थिति में पहुंच चुके हैं.

गौरतलब है कि इस बार का चुनाव बक्सर में राजनीतिक गंभीरता से ज्यादा मजाक और तमाशे की तरह बन चुका है. एक ओर असली मतदाता उलझन में है कि आखिर किसे चुना जाए, वहीं दूसरी ओर नेता जी अपनी ही तस्वीरों को देखकर आत्ममुग्ध हो रहे हैं. जनता का दुख-दर्द, रोज़मर्रा की समस्याएं और जिले का विकास सब पीछे छूट गया है. बक्सर की गलियों से लेकर सोशल मीडिया तक यह स्पष्ट है कि यहां मतदाता कम और दावेदार ज्यादा हैं. असली सवाल यह है कि क्या बक्सर की जनता इन दिखावटी और पैसों से बने नेताओं को पहचान पाएगी? या फिर एक बार  वही होगा – चुनाव खत्म, पोस्टर हटे और जनता फिर ठगी गई?

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