जिनके अपने ही घर में नही है वजूद ! वह अपने समाज के भिंड को वोट में तब्दील करने का कर रहे है दावेदारी!

 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में नामांकन से पहले ही वोट दिलाने से लेकर भिंड जुटाने तक का होने लगी राजनीतिक ठेकेदारी ! तथकथित समाजसेवी लेने लगे टेंडर ! जिनके अपने ही घर में नही है वजूद ! वह अपने समाज के भिंड को वोट में तब्दील कर देने का कर रहे है दावेदारी! विकास के भरोसे नही, ठेकेदार के भरोसे चुनावी नैया पार करने की नेता जी की है तैयारी ! स्थानीय लोगो के आरोप से उठने लगे है सवाल. क्या राजनीति की मंडी में जनसेवा ने ले ली धन सेवा की स्थान ?

चुनावी माहौल में नेता जी !

बक्सर-  चुनावी मौसम आते ही राजनीति का रंग अचानक गाढ़ा हो जाता है. जो नेता जी पिछले पाँच वर्षों तक जनता की गलियों से गुम थे, वही अब सड़कों पर हाथ जोड़ते और मंदिरों में प्रसाद चढ़ाते दिख रहे हैं. गाड़ी, बंगला और सुरक्षा काफिला फिर सक्रिय है—मकसद एक ही, वोट की नैया पार लगाना !

धनबल और बाहुबल के सहारे नेता जी !

 धनबल और बाहुबल के सहारे टिकट पाने की दौड़ में इन ‘जनसेवकों’ की सांसें फूली पड़ी हैं. सेवा के बदौलत वोट रूपी जनता का आशीर्वाद भी अब ठेकेदारी में पूरी तरह से तब्दील होते दिखाई दे रही है., आलम यह है कि जिन तथाकथित समाज सेवको की अपने घर में ही कोई वजूद नही है. वह अपने जाती और समाज का वोट  दिलवाने का ठेकेदारी ले रहा है. मानो राजनीति अब बिचारो का नही निवेश का खेल बन गया हो ! पहले लगाओ फिर दोहन करो !

राजनीति विचारों का नही निवेश का खेल !

राजनीति अब विचारों का नहीं, निवेश का खेल बन गई है. चुनाव के समय लाखो खर्च कर नेता जी पांच बर्षो में करोड़ो की वसूली करते है.स्थानीय लोगों की माने तो पाँच साल तक सिर्फ विवाह समारोह और श्राद्ध भोज में पूरी खाने निकले नेता जी अब खुद को “जनता का मसीहा” बताने में जुटे हैं. जिन सड़कों पर कभी विकास का वादा किया गया था, आज वहां गड्ढे हैं, और जिन स्कूलों में सुधार का दावा था, वहां ताले लटके हैं. पर नेता जी के भाषणों में अब भी “विकास” शब्द का उतना ही प्रयोग है जितना प्रचार पोस्टरों में मुस्कुराते चेहरे का!

राजनीति में शुरू हुई वोट की ठेकेदारी !

बक्सर जिले की राजनीति में इन दिनों एक नया समीकरण उभर रहा है — “ठेकेदारी समाज सेवा” का. जो लोग कभी राजनीति के नाम पर लाउडस्पीकर उठाते थे, अब उम्मीदवारों के लिए जनसंपर्क का ठेका ले रहे हैं. कहा जा सकता है कि लोकतंत्र अब वोटों की मंडी में बदल गया है, जहाँ भाव तय होता है “धनबल” के हिसाब से. आलम यह है कि तथकथित समाज सेवक अब चुनावी सभा में भिंड जुटाने के लिए संख्या बल का ठेकेदारी ले रहे है. जिसका पूरी मेनू चार्ट बनाकर नेता जी को पेश किया जाता है.और उसके हिसाब भिंड जुटाने की ठेकेदारी चलती है. यही कारण है कि नेता जी का पोस्टर हाथों में थामने वाले वैसे लोग अपने नेता जी को पहचान भी नही बता पाते है! कई जनप्रतिनिधि जिनके कार्यकाल में जनता की समस्याएँ जस की तस रहीं, वे अब अपने पोस्टरों में “विकास पुरुष” बन गए हैं. सड़कों की धूल और अस्पतालों की बदहाली को जनता झेल रही है, लेकिन मंच से वही पुराने वादे दोहराए जा रहे हैं—“हम विकास लाएंगे, रोजगार देंगे, युवाओं को सशक्त बनाएंगे।.” विडंबना यह है कि यही वादे पिछले कई चुनावों से हर उम्मीदवार की जुबान पर हैं, पर हकीकत में जनता को अब तक सिर्फ ठंडी आश्वासन की थाली के सिवा कुछ नही मिला !

क्या कहते है राजनीति के जानकार !

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बक्सर की राजनीति जातीय समीकरणों और आर्थिक ताकत के इर्द-गिर्द घूम रही है. आम मतदाता अब भावनाओं से ज्यादा चेहरे पहचानना सीख रहा है, पर चुनाव आते ही वही पुराना नारा—“हमारे समाज का, हमारे गाँव का”—फिर से गूंज उठता है। जनता की याददाश्त पर भरोसा करते हुए नेता जी फिर वही वादों की झोली फैलाए खड़े हैं., और जनता खुद के लिए बेहतर चुनने के बजाए जात-पात के नाम पर मतदान कर पांच बर्षो तक हाथ मलते रहती है.और नेता जी एक और लग्जरी कार और बंग्ला समेत करोड़ो का बैंक बैलेंस जमा कर लेते है. पांच साल पहले जिस नेता जी के पास पान खाने के लिए पैसे,और यात्रा करने के लिए दो पहिया वाहन तक  नही था. इस राजनीति रूपी खेती से पांच बर्षो में करोड़ो के लग्जरी वाहनों का मालिक बन गए.और जनता मेरे जाती के नेता जी के नाम पर अपने बच्चों के भविष्य का बागडोर उनको दे दी!अब  सवाल बार-बार उठ रहा है की—“क्या लोकतंत्र अब भी जनता का है, या ठेकेदारों का?” क्योंकि जिन तथाकथित समाजसेवकों के दम पर वोट बटोरे जा रहे हैं, वे खुद पिछले वर्षों में सरकारी योजनाओं से ज्यादा कमीशन योजनाओं में सक्रिय रहे हैं!

गौरतलब है कि बक्सर की राजनीति आज एक दर्पण बन चुकी है, जिसमें लोकतंत्र का चेहरा नहीं, उसका मेकअप झलकता है.  सवाल यह है की जब जनप्रतिनिधि ‘विकास’ की नहीं, ‘वोटों’ की ठेकेदारी करने लगें, तो बदलाव की उम्मीद किससे की जाए?

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