. दोनों गठबंधनों के लिए सिरदर्द बना एक तीसरा चेहरा—
नामांकन का दिन बना “शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा”, बक्सर में दिखी दो रंग की सियासत ता ता तुना’ बनाम ‘गांजा तस्करी’—बक्सर की चुनावी जंग अब जुबानी जंग में तब्दील!पूर्व आईपीएस मिश्रा बोले—“लोकतंत्र में सबको आज़ादी है”, विधायक ने पलटवार में दी “सेब और कमल” की सीख! किला मैदान बनाम आईटीआई ग्राउंड सभा स्थलों ने भी दिखाया गठबंधन का सियासी रंग!पर्दे के पीछे की चाल—हार मान चुके नेता ने जातीय समीकरण से उलझाया पूरा खेल!
बक्सर -विधानसभा की राजनीति में शुक्रवार का दिन नामांकन से ज़्यादा “नाटक” का दिन बन गया. एक तरफ इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार और वर्तमान विधायक संजय कुमार तिवारी उर्फ मुन्ना तिवारी, तो दूसरी ओर एनडीए की तरफ से मैदान में उतरे असम कैडर के पूर्व आईपीएस आनंद मिश्रा—दोनों ने नामांकन से पहले ऐसा शक्ति प्रदर्शन किया, जैसे नामांकन नहीं, “महाभारत” का युद्ध शुरू हो गया हो.किला मैदान और आईटीआई ग्राउंड, दोनों जगह हजारों की भीड़, गाड़ियों का काफिला, डीजे की धुन और नारेबाज़ी का शोर... चुनावी हवा में अब सिर्फ एक ही बात तैर रही है—“कौन बनेगा बक्सर का बादशाह?”
किसी ने लगाए जय श्रीराम के नारे तो किसी ने कहा भारत माता की जय !
नामांकन के बाद शुरू हुआ असली ड्रामा. मंचों पर ‘जय श्रीराम’ और ‘जय भारत माता’ के बाद नेताओं के भाषणों में “जय व्यंग्य का बाण चलता रहा . पूर्व आईपीएस आनंद मिश्रा ने अपने प्रतिद्वंद्वी विधायक मुन्ना तिवारी पर तंज कसते हुए कहा—“अब विधायक ता ता तुना करेंगे!” भीड़ ने ठहाके लगाए और कैमरों ने क्लिप रिकॉर्ड की. लेकिन राजनीति में तंज का जवाब इंडिया गठबंधन के विधायक ने तंज से ही दिया. विधायक संजय तिवारी ने पलटवार करते हुए कहा—“सेब सड़कर कमल बन गया है! असम में गांजा की तस्करी करने वाले को बक्सर की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी.” बयान उड़ा नहीं, बल्कि “वायरल” होकर पूरे ज़िले में गूंज गया.
क्या कहते है आनन्द मिश्रा ?
पत्रकारों ने जब आनंद मिश्रा से पूछा—“2024 में भाजपा नेता आपको ‘अर्बन नक्सली’ कहते थे, अब उन्हीं के साथ मंच साझा कर रहे हैं?”, तो मिश्रा का जवाब उतना ही ठंडा था जितना एक सेवानिवृत्त फाइल का पेपर—“राजनीति में यह सब चलता रहता है, लोकतंत्र में सबको चुनाव लड़ने की आज़ादी है.”लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. दोनों गठबंधनों के लिए सिरदर्द बना एक तीसरा चेहरा—वो नेता जो टिकट पाने में असफल रहा, पर सियासी चालों में अव्वल निकला. उसने पर्दे के पीछे से जातीय समीकरण की बिसात बिछाते हुए एक नहीं, बल्कि तीन अन्य प्रत्याशियों से नामांकन करा दिया. अब बक्सर की राजनीतिक गली में चर्चा है—“जिसे टिकट नहीं मिला, वही अब चुनाव को उलझा रहा है.”
दोनों मंचो पर सियासत की गूंज !
दोनों मंचों पर सियासत की गूँज थी, लेकिन जनता के मन में सवाल भी—क्या यह चुनाव विकास का है या व्यंग्य का? प्रशासन ने भले ही सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किए हों, पर सियासी बयानबाज़ी की आतिशबाजी ने माहौल गर्म कर दिया है.अब देखना दिलचस्प होगा कि जनता ‘ता ता तुना’ में रम जाएगी या ‘सेब और कमल’ के व्यंग्य में उलझ जाएगी. पर एक बात तय है—बक्सर की धरती इस बार केवल चुनाव नहीं, बल्कि “सियासी रंगमंच” देखने वाली है, जहाँ हर नेता अभिनेता है और हर वोटर समीक्षक की भूमिका में दिखाई दे रहा है



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