जनसुराज से लेकर भाजपा तक — मिश्रा की चाल में छिपा सियासी जाल! अब बक्सर भाजपा के लिए सवाल — बाहरी नेता ज़रूरी या मजबूरी?

 पूर्व आईपीएस आनन्द मिश्रा ने राजनेताओं को पढ़ाया राजनीति का नया पाठ — बिजली के खंभे, पेड़ और ऑटो पर ही लटके रह गए बीजेपी के पांच दर्जन दावेदार!जो कभी "अर्बन नक्सली" कहते थे, आज वही माला पहनाकर पैर पूजने को तैयार! जनसुराज से लेकर भाजपा तक — मिश्रा की चाल में छिपा सियासी जाल! अब बक्सर भाजपा के लिए सवाल — बाहरी नेता ज़रूरी या मजबूरी?

वर्दी से खादी तक !

बक्सर: जिले की सियासत में इन दिनों एक ही नाम की गूंज है — आनन्द मिश्रा। कभी “पूर्व आईपीएस”, अब “पूर्णकालिक राजनेता”, और शायद आने वाले चुनावी मौसम में भाजपा के लिए ‘चुनावी ब्रह्मास्त्र’। दिलचस्प बात यह है कि जिन्हें कभी भाजपा के बड़े नेता “अर्बन नक्सली” कहकर कोसते थे, आज वही नेता उन्हें फूलों की माला पहनाकर पैर पूजते दिख रहे हैं। राजनीति में इससे बड़ा यू-टर्न शायद ही कभी देखा गया होगा।

लोकसभा चुनाव में लिखी थी पूरी पटकथा!

2024 के लोकसभा चुनाव में आनन्द मिश्रा ने जिस तरह भाजपा के ही उम्मीदवार मिथलेश तिवारी को शिकस्त दिलाने में पर्दे के पीछे भूमिका निभाई और फिर खुद मैदान में उतरकर चुनाव की पूरी पटकथा रची, उसने उनकी सियासी समझ पर कोई संदेह नहीं छोड़ा। मिश्रा ने विरोधियों के साथ-साथ पार्टी के भीतर बैठे “अपनों” को भी नया सबक सिखाया — राजनीति में वर्दी उतर सकती है, पर रणनीति हमेशा काम आती है।

जनसुराज के मंच से दिखाया भाजपा को आईना, फिर लौट आए उसी छांव में!

जब भाजपा ने उन्हें लोकसभा का टिकट नहीं दिया, तब उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़कर भाजपा के ही प्रत्याशी मिथलेश तिवारी को हार के दरवाजे तक पहुंचा दिया। इसके बाद वे जनसुराज मंच से भाजपा पर जमकर बरसे। लेकिन वक्त ने करवट ली — और वही आनन्द मिश्रा अब भाजपा के दरवाजे पर लौट आए, उनकी एंट्री ने बक्सर भाजपा के भीतर भूचाल ला दिया। टिकट की उम्मीद में खड़े लगभग पांच दर्जन दावेदार अब बिजली के खंभों, पेड़ों और ऑटो के पोस्टरों तक सिमटकर रह गए हैं। टिकट की दौड़ में उनकी उम्मीदें ऐसे बिखरीं जैसे तेज तूफान में तिनके उड़ जाते हैं।

हर चुनाव में बक्सर को चाहिए बाहरी उम्मीदवार!

सवाल उठता है — आखिर हर बार बक्सर को “बाहरी” चेहरा ही क्यों चाहिए होता है? क्या स्थानीय नेता केवल झोला उठाने और सभा स्थल सजाने तक सीमित रह गए हैं? या फिर पार्टी हाईकमान जनता की नब्ज़ से ज़्यादा “ब्रांड इमेज” पर भरोसा करने लगी है?

क्या कहते हैं राजनीतिक जानकार?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आनन्द मिश्रा की एंट्री भाजपा के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। अवसर इसलिए कि वे प्रशासनिक अनुभव और जनसंपर्क की पूंजी लेकर आए हैं, और चुनौती इसलिए कि उनका उभार भाजपा के पुराने नेताओं की फीकी पड़ती साख को उजागर कर गया है.बक्सर की गलियों में चर्चा है — “जो कभी मिश्रा पर सवाल उठाते थे, अब उन्हीं की जय बोल रहे हैं।”यह राजनीति का वही दौर है जहाँ विचारधारा से ज़्यादा “विजेता चेहरा” मायने रखता है। यही वजह है कि भाजपा के सियासी धुरंधर आज चारों खाने चित नज़र आ रहे हैं, जबकि आनन्द मिश्रा अपनी रणनीति की चौसर पर नया खेल बिछा चुके हैं।

गौरतलब है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में यह “राजनीतिक शतरंज” किस दिशा में जाएगी — यह देखना दिलचस्प होगा। क्या भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ता इस बाहरी चेहरे को दिल से स्वीकार करेंगे, या फिर बक्सर में एक बार फिर “झोला राजनीति” का नया अध्याय शुरू होगा?

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