बक्सर के नेता जी लोकतंत्र की लगा रहे है बोली !जनसेवा के आड़ में टिकट लेने के लिए पहुँची है बाहुबलियों और धन पशुओं की पूरी टोली ! अब मिनी काशी नही मिनी सिंगापुर बनने को तैयार है बक्सर???????

 बक्सर के नेता जी लोकतंत्र की लगा रहे है बोली !जनसेवा के आड़ में टिकट लेने के लिए पहुँची है बाहुबलियों और धन पशुओं की पूरी टोली ! हवाई जँहाज की उड़ान में छिपा है विधानसभा टिकट का राज़! जनता पूछे—विकास कहाँ है आज? 

बक्सर - राजधानी पटना से 120 किलोमीटर पश्चिम और मुगलसराय से 100 किलोमीटर पूरब उत्तरायणी गंगा की तट पर बसा यह बक्सर इन दिनों राजनीतिक तापमान में उबल रहा है. जिले की चारों विधानसभा सीटें चुनावी मेला बन चुकी हैं—जहाँ वादों की दुकानें सजी हैं, लेकिन माल के नाम पर झूठ की पोटलियाँ ही बिक रही हैं. यहाँ लोकतंत्र नहीं, टिकट का ‘ऑक्शन’ चल रहा है.नेता जी दिल्ली, लखनऊ और पटना की उड़ानें भर इस सीट को “खरीदने” के लिए बोली लगा रहे है. 

समस्या नही वोट बैंक के इर्द -गिर्द घूम रही है राजनीति !

अपने खेतों की पगडंडियों पर खड़े होकर फसलों को निहार रहे 85 बर्षीय किसान राम लखन काका पूछते है. "का भइल के बा चुनाव लड़त"  अब त केहू आवते नइखे ! सब लोग पइसा पर ही चुनाव जीत लेत बा" एगो समय रहे कि चुनाव के पहिले ही हमनी के गुड़ दलान में रख लेत रहनी जा. की पाता ना केतना रात में कौन नेतावा वोट मांगे आ जाई " --अब सवाल यह है कि इस जिले की राजनीति आखिर घूमती किसके इर्द-गिर्द है? जवाब सीधा है—“वोट बैंक” के इर्द-गिर्द। ब्राह्मण, दलित, यादव, कुशवाहा, मुस्लिम, सवर्ण—हर जाति  बस एक गणित है मेरा जाती वाला जीत जाए .शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान, रोज़गार जैसे शब्द अब भाषणों के शृंगार बन गए हैं, जिनका ज़मीनी हकीकत से कोई रिश्ता ही नहीं.

उमीदवारों की डिजिटल सेना है लाव-लश्कर के साथ तैयार !

सोशल मीडिया पर उम्मीदवारों की “डिजिटल सेना”  पूरी तरह से सक्रिय है—झूठ को भक्ति बनाकर परोसा जा रहा है. एक पोस्ट में विकास के पुल दिखते हैं, तो अगले ही पोस्ट में टूटी सड़कें और अधूरे अस्पताल.  पर असली सच्चाई ये है कि बक्सर की जनता अब “विकास” के नाम पर ठगी खाने की आदत डाल चुकी है.जो नेता पिछले चुनाव में जीतकर गए थे, उनके पास वादों के सवाल का कोई जवाब नहीं. और जो हार गए थे, वे इस बार नए वादों की बोरियां लेकर फिर से लोकतंत्र की दुहाई देते हुए जनता के दरवाज़े पर हैं. न सड़के सुधरीं, न स्कूल चले, न अस्पतालों में दवा पहुँची—लेकिन भाषणों में बक्सर अब मिनी काशी से चार कदम आगे बढ़कर “मिनी सिंगापुर”  बनने को तैयार है!

किसानों के नाम पर होती है इस देश में राजनीति ! 

देश- प्रदेश या पँचायत में जब भी चुनाव होते है. तो मुद्दे में किसान और उनकी बदहाली होता है. लेकिन चुनाव खत्म होते ही मुद्दे से किसान को ऐसे गायब कर दिया जाता है. जैसे आग की सम्पर्क में आते पेट्रोल गायब हो जाता है. लेकिन जमीनी हकीकत यही है की देश की सबसे बड़ी आबादी किसानों की है.जो अपने संक्रमण काल के दौर से गुजर रहे है. योजना सरकारें किसानों के नाम पर बनाती तो तो जरूर है. लेकिन उसे सरकारी बाबू ही डकार जाते है. आजादी के आठ दशक बाद भी जिले के किसान अभी भी अपनी फसल लेकर सोचता है कि मंडी कब बनेगी ? छात्र सोचते हैं कि शहर छोड़े बिना बेहतर शिक्षा कभी मिलेगी भी या नहीं ?बीमार लोग अब भी अस्पताल पहुँचने से पहले निजी क्लीनिक के चक्कर काटते हैं! लेकिन नेताजी के भाषणों में सब ठीक है, बस जनता की आँखें बंद रहनी चाहिए. और जाति की राजनीति जिंदा रहनी चाहिए !

राजनीति की आईना में अब नही दिखता चेहरा !

बक्सर की राजनीति आज एक आईना बनकर रह गया है. जिसमें लोकतंत्र का चेहरा नहीं, सिर्फ उसका मुखौटा दिखाई देता है. यह वही जिला है जहाँ इतिहास ने कई क्रांतियाँ देखीं, लेकिन आज की लड़ाई सिर्फ टिकट की है. जन कल्याण की नही ! 

गौरतलब है कि सियासत जन सेवा के आड़ में धन संग्रह करने का अब धंधा बनते जा रहा है. यही कारण है कि राजनीतिक पार्टियां किसी कमजोर या जमीनी व्यक्ति को टिकट देने के बजाए धन पशुओं और बाहुबलियों पर ही अपना दाव लगाती है.

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